सोमवार, 6 सितंबर 2021

buddha dharma history in hindi (बौद्ध धर्म का इतिहास)|

 बौद्ध धर्म का इतिहास (history of buddhism in hindi)


buddha dharma history in hindi (बौद्ध धर्म का इतिहास)|
buddha

गौतम बुद्ध का जन्म
 गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था । इनके पिता शुद्बोधन शाक्य वंश के मुखिया थे। इनकी माता मायादेवी थी ।जिनकी मृत्यु बुद्ध के जन्मदिन के 7 दिन बाद ही हो गयी इनकी धायमाँ गौतमी ने उनका लालन-पालन किया। इसी दौरान कौडिल्य नामक ब्राह्मण का आगमन हुआ और उसने यह भविष्यवाणी की यह बालक एक महान चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या सन्यासी जीवन व्यतीत करेगा । शुद्धोधन ने अपने पुत्र के लिए एक अलग से महल का निर्माण करवाया और भोग विलासिता वाली सभी सुविधाएँ प्रदान की ।   बौद्ध धर्म का संस्थापक गौतम बुद्ध हैं।

शिक्षा एवं विवाह
सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र से वेद और उपनिषद्‌ की शिक्षा ग्रहण की , राजकाज और अस्त्र -सस्त्र , युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में वो पूर्णतः निपुण थे, उसकी बराबरी नहीं कर पाता था। 16 वर्ष की उम्र में उनका विवाह दण्डपाणि शाक्य कुल की राजकुमारी यशोधरा/ बिम्बा/ गोपा के साथ हुआ । जिनसे इन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम राहुल था। 

व्याकुलता
 एक दिन शुद्बोधन की अनुपस्थिति में जब सिद्धार्थ शिकार पर निकले तो उन्हें बुजुर्ग व्यक्ति, रोगी , मृतशैया , सन्यासी आदि दिखाई दिये, अतः जीवन के इन रूपों को देखकर सिद्धार्थ के मन में अंतर्द्वंद्व उत्पन्न हो गया और वो सोचने लगे की जीवन के इन सभी समस्याओं से मुक्ति पाने का कोई मार्ग नही हैं क्या ? 

 महाभिनिष्क्रमण

अपने मन में उत्पन्न सवालों के जवाब (सांसारिक जीवन के उद्देश्यों ) को खोजने के लिये उन्होंने 29 वर्ष की आयु में सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे पुत्र राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर , सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े। इतिहासकारों ने इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा हैं ये अपने साथी चरणा और घोड़े छन्दक के साथ घर से बाहर निकले और अनोमा नदी के तट पर अपने बालों व राजशाही वस्त्रों का त्याग कर दिया व अपने साथी चरणा और घोड़े को यहां से वापस भेज दिया। 

ज्ञान प्राप्ति
सिद्धार्थ कुछ समय पश्चात घूमते हुए आलारकलाम के आश्रम में पहुंचे , जहाँ उन्होंने सांख्यदर्शन का ज्ञान प्राप्त किया, लेकिन आलरकलाम से संतुष्टि न मिलने के कारण आश्रम छोड़ दिया इसके पश्चात सिद्धार्थ ने राजगीर के रुद्रकरामपुत्त से शिक्षा ली। यह से निकलने पर उरुवेला नामक स्थान पर कौडिन्य, बप्पा ,भदिया ,महानामा एवं अस्सागी नामक 5 साधक मिले और जब वे अपने 5 साधको के साथ गया पहुंचे तो यहां पर सुजाता नामक शुद्र कन्या के हाथों से इन्होंने खीर ग्रहण कर ली, जिसके कारण इनके साथियों ने इनका साथ छोड़ दिया, जिससे इनको बहुत ठेस पहुंची। 



सम्बोधि(ज्ञान)
 बुद्ध ने गया में ही पीपल के वृक्ष के नीचे निरंचना नदी के तट पर वर्षों की धोर तपस्या की। अतः उन्हें 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन सम्बोधि (ज्ञान ) की प्राप्ति हुई। ज्ञान (सम्बोधि) प्राप्ति के बाद ये बुद्ध कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जानें गये और उन्हें जिस पीपल के वृक्ष के नीचे सम्बोधि की प्राप्ति हुई वह बोधि वृक्ष तथा वह स्थान बोधगया कहलाया । 

महापरिनिर्वाण (Mahaparinirvana in buddha dharma)
 महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम तपस्य और कालिक नामक शुद्धो को अपना शिष्य बनाया। इसके पश्चात् ऋषिपत्तनम (सारनाथ) पहुंचे जहां अपने बिछड़े हुए साथियों को उपदेश दिए इसे "धर्मचक्र प्रवर्तन" कहा जाता है। बुद्ध ने अपने उपदेश संस्कृत में ना देते हुए जनसाधारण की भाषा "पाली" में दिया । महात्मा बुद्ध धर्मप्रचार करते हुए जब वैशाली पहुंचे तो वहां की नगर वधु (गणिका) आम्रपाली ने बुद्ध से प्रभावित होकर आम्र उद्यान दान में दे दिया। इसके बाद जब बुद्ध कपिलवस्तु पहुंचे तो अपने पुत्र राहुल से बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। यहां पर अपने प्रिय शिष्य आनन्द के कहने पर अपनी धायमाँ गौतमी को अपनी प्रथम शिष्या बनाया।

अष्टमहास्थान (बुद्ध से जुड़े 8 - स्थान )
महात्मा बुद्ध 483 बी. सी में हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित कुशीनगर पहुंचे तो वहां चुन्द नामक व्यक्ति द्वारा अर्पित किये गये भोजन के कारण बुद्ध तबीयत खराब हो गई जिसके कारण 80 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई जिसे बोद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण (मृत्यु) कहा जाता हैं।

सिद्धांत
 महात्मा बुद्ध ने पुर्नजन्म को स्वीकार किया है, लेकिन पुर्नजन्म के लिए ये सिर्फ कर्म को उत्तरदायी मानते है, आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं। पुर्नजन्म के लिए तृष्णा (लालच) उत्तरदायी है और लालच क्षणिक सुख की प्राप्ति है। क्षणमगुरवाद का सिद्धांत अतः मोक्ष प्राप्ति के लिए महात्मा बुद्ध ने त्रिरत्न की बात कही, जो कि- 1. बुद्धम शरणम् गच्छामि। 2.धम्मम् शरणम् गच्छानि। 3. संघम शरणम् गच्छानि।

अष्टांगिक मार्ग (eightfold path of buddha dharma)
◆ महात्मा बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग, मध्यम मार्ग प्रदान किए जो कि निम्नलिखित है-  1.सम्यक दृष्टिक 2. सम्यक संकल्प 3. सम्यक वाणी 4. सम्यक कर्मास (कर्मान्त) 5. सम्यक आजीव 6. सम्यक व्यायाम 7. सम्यक स्मृति 8. सम्यक समाधि
 ◆अष्टांगिक मार्ग को निक्षुओं का कल्याण मित्र बताया गया है। महात्मा बुद्ध ने 4 आर्यसत्य दिए है- 1 दुःख          2. दुःख निरोध।  3. दुःख समुदाय                 4. दुःख ।निरोधगामिनी प्रतिपदा बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरान्त मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त हो जाता है।


बुद्ध के 10 शील (10 modesty of buddha dharma)
 निर्वाण बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य है, जिसका अर्थ है "दीपक का बुझ जाना" अर्थात् जीवन मरण चक्र से मुक्त हो जाना। बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति को सरल बनाने के लिए निम्न दस शीलों पर बल दिया हैं - 1 अहिंसा, 2 सत्य, 3. अस्तेय (चोरी न करना), 4 अपरिग्रह (किसी प्रकार की सम्पत्ति न रखना), 5. मद्य- सेवन न करना, 6. असमय भोजन न करना, 7 सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना, 8. धन संचय न करना, 9. स्त्रियों से दूर रहना और 10. नृत्य गान आदि से दूर रहना। गृहस्यों के लिए केवल प्रथम पाँच शील तथा भिक्षुओं के लिए दसों शीत मानना अनिवार्य था। बुद्ध ने मध्यम मार्ग (मध्यमा प्रतिपद) का उपदेश दिया।

महात्मा बुद्ध के महत्वपूर्ण उपदेश (Important teachings of Mahatma Buddha)
 (1) बुद्ध ने 10 शीलो के अनुशीलन को नैतिक जीवन का आधार बनाया है। 
 (2) बुद्ध अनीश्वर (अ + ईश्वर) है, उन्होंने ईश्वर के स्थान पर मानव प्रतिष्ठा पर बल दिया है।
(3) बुद्ध ने कर्मकाण्डों का विरोध करते हुए अपौरूष्य नहीं हैं।
 (4) बौद्ध संघ में प्रवेश होने को उपसंपदा कहा है। अतः बौद्ध संघ में प्रस्ताव पाठ रखा जाता था, जिसे अनुसावन कहते थे। बौद्ध संघ, गणतंत्रात्मक व्यवस्था पर आधारित था। 
(5) बुद्ध ने अपने संघ में चोर, हत्यारे, रोगी, हताश, ऋणी आदि व्यक्तियों को प्रवेश से वंचित कर दिया था।
(6) बौद्धों का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार वैशाख पूर्णिमा है, जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहा गया है।
(7) महात्मा बुद्ध को बुद्ध पूर्णिमा के दिन, बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति और बुद्ध का महापरिनिर्वाण इसी दिन हुए है।  

बौद्ध संगतियाँ (Buddhist Associations of Buddha Dharma)
बुद्ध के महापरिनिर्वाण (मृत्यु ) के पश्चात बौद्ध धर्म (buddha dharma) में संगतियाँ का आयोजन किया गया ।
 
◆ प्रथम बौद्ध संगति  - 483 बी.सी (First Buddhist Association - 483 B.C.)
1. स्थान                      -          राजगृह 
2. शासक                    -        अजातशत्रु 
 3. अध्यक्ष                    -          महाकश्यप 
 4. विषयवस्तु     -   बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् बौद्ध संघ का संचालन के लिए पिटाको की रचना की गयी। 
5. बौद्ध भिक्षुओं की संख्या -       500 
 ●सूक्त पिटक -  बौद्ध धर्म के उपदेश (teachings of buddhism)
 ● विनय पिटक- संघ का संचालन करने के लिए नियमावली। 

 द्वितीय बौद्ध संगतियाँ 383 बी.सी  (Second Buddhist Associations 383 B.C.)
 
1. स्थान             -          वैशाली 
 2. शासक          -          कालाशोक (कर्क वर्ण) 
 3. अध्यक्ष          -         सबकामी
 4. विषयवस्तु     -    बौद्ध संघ में नियमों के संचालन के संबंध में संघ में मतभेद उभरकर सामने आए, जिसके कारण बौद्ध संघ दो भागों में बंट गया अर्थात जो बौद्ध संघ के नियमों में परिवर्तन नहीं चाहते थे, वे स्थांवर कहलाए और जो परिवर्तन चाहते थे वे महासांघवीर कहलाए।
 5. बौद्ध भिक्षुओं की संख्या       -   700

 तृतीय बौद्ध संगतियाँ 252-51 बी.सी    (Third Buddhist Associations 252-51 B.C.)
 1 स्थान                -           पाटिल्यपुत्र
 2 अध्यक्ष              -         मोग्गलीपुत्त तिस्स
 3  राजा।               -               अशोक 
 4. विषयवस्तु       - बौद्धदर्शन का संकलन करने के लिए तृतीय बौद्ध संगति का आयोजन, इसमें अभिधम्म पिंटक की रचना हुई। 

 चतुर्थ बौद्ध संगतियाँ 78 ए. डी.( Fourth Buddhist Associations 78 A.D.)
 1 स्थान            -        कश्मीर के कुण्डलवन 
 2 शासक.         -             कनिष्क 
 3 अध्यक्ष          -            वसुमित्र 
 4 विषयवस्तु     -   बौद्ध संघ में बुद्ध की मूर्ति के रूप में पूजा को लेकर मतभेद सामने आए, अतः इसी कारण से बौद्ध धर्म दो भागों में बंट गया जो बुद्ध की मूर्ति के रूप में पूजा नहीं करना हीनयान । जो बुद्ध की मूर्ति के रूप में पूजा चाहते- महायान । 

बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण तथ्य (Important facts of Buddhism)

1 .बौद्ध धर्म (buddha dharma) में आगे जाकर दो नये विचारों का आगमन हुआ- शून्यवाद, जिसके प्रवर्तक नागार्जुन थे तथा विज्ञानवादी, जिसके प्रवर्तक मैत्रयी थे। शून्यवाद को माध्यमिका भी कहते है। 
 2. नागार्जुन को भारत का आइंस्टीन कहा जाता है। 
 3.शून्यवाद, विज्ञानवाद महायान शाखा से सम्बंधित है।   
 4.बज्रयान शाखा (बौद्ध धर्म) 7 वी शताब्दी में सामने आयी , इसमें शाखा में तंत्र - मंत्र की आराधना की जाती थी और इसमें देवी तारा की पूजा की जाती थी।
5. बुद्ध जन्म की पूर्व कम्याए जातक कथाए (सुक्त पिटक) में वर्णित है। 
 6. 5 वीं शताब्दी में महान पाली विद्वान विशुद्धिमग बौद्ध ग्रंथों की रचना की थी, इसे त्रिपिटक की कुंजी के समान बोला गया है। 
 7. बौद्ध धर्म की सबसे प्रसिद्ध जातक कथा खुद्दक में है
  8. मध्यकालीन न्याय शास्त्र के जनक दिगनांग थे जो बौद्ध धर्म में तर्कशास्त्र के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। 

 9. बौद्धों के समाधि स्थल स्तूप कहे जाते है। अत: विश्व का सबसे बड़ा बौद्धस्तूप बोरोबुदूर का स्तूप है, जो कि इण्डोनेशिया के शैलेन्द्र राजाओं के द्वारा जावा में बनवाया गया था।  
10. शंकराचार्य को आगे जाकर प्रच्छन्न बौद्ध कहा गया।
12. बौद्ध के साहित्यों को पिटक कहा जाता है, जो कि पाली भाषा में लिखे गए हैं। बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश पाली भाषा में दिए है, जो उस समय की आर्य भाषा थी।

 13.जैनों ने अपने सर्वाधिक उपदेश प्राकृत भाषा में दिए है, और इनके साहित्य को आगम कहा गया है। 

 क्र.                           घटना                  प्रतीक चिन्ह 

 1.                  महामाया का स्वप्न     -       सफेद हाथी

 2.                          गृहत्याग            -          घोङे

 3.                           ज्ञान               -     पीपल (बोधिवृक्ष) 

 4.                          निर्वाण            -         पदचिह्न

  5.                          मृत्यु             -       स्तूप(समाधिस्थल) 
 
14.बौद्ध साहित्य में महावीर को निग्रयाज्ञापुत्र या निगण्ठनाथपुत्र कहा गया है।

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