मध्य प्रदेश के इतिहास और पुरातात्विक अतीत का उद्भव (प्रागैतिहासिक काल)
मध्य प्रदेश के इतिहास और पुरातात्विक अतीत का उद्भव प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Age) से माना जाता हैं। मध्य प्रदेश भारत में मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास का प्रारम्भिक केन्द्र रहा है। मध्य प्रदेश के विस्तृत भू-भाग पर मानव इतिहास के सुविधापूर्ण अध्ययन के लिए प्रागैतिहासिक काल को विभिन्न कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है:-
मध्य प्रदेश प्रागैहातिसिक काल-
1.पुरापाषाण काल
3.मध्यपाषाण
4.नवपाषाण काल
4.नवपाषाण काल
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पुरापाषाण काल (Paleolithic Period)
पुरापाषाण काल में मध्य प्रदेश दक्षिण भारत व उत्तर भारत के तत्कालीन हथियारों, औजारों तथा विभिन्न उद्योगों का संगम स्थल रहा था। मध्य प्रदेश में नर्मदा, चंबल, बेतवा, सुनार एवं सोन आदि नदी घाटियाँ तथा भीमबेटका, आदमगढ़, जावरा, रायसेन एवं पचमढ़ी आदि स्थल पुरापाषाण काल से सम्बंधित हैं। नर्मदा घाटी पाषाण कालीन मानव सभ्यता के विकास की मुख्य भूमि रही है।
नर्मदा घाटी से ही सर्वाधिक पाषाण कालीन स्थल एवं उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर हस्तनिर्मित एवं प्राकृतिक वस्तुओं को औजार या हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता था।
इस काल के प्रमुख औजारों में बिना हत्थे वाली कुल्हाड़ी, हत्थे वाली कुल्हाड़ी (हस्तकुठार), खरचन तथा मुष्ठ आदि सम्मिलित थे। ये कुल्हाड़ियाँ नर्मदा घाटी के उत्तर में देवरी, सुकचाई नाला बुधाना, केन घाटी, बरखस, संग्रामपुर तथा दमोह जिले से प्राप्त हुई है। अमरकंटक से होशंगाबाद जिले तक विस्तृत नर्मदा घाटी से स्तनधारी पशुओं के जीवाश्म भी प्राप्त हुए हैं।
पुरातत्वज्ञ डॉ अरुण सोनकिया ने 5 दिसम्बर, 1982 को सीहोर जिले के हथनोरा नामक स्थल के उत्खनन के दौरान मानव जीवाश्म (मानव खोपड़ी) के साक्ष्य प्राप्त किए, जो अब तक भारत में प्राप्त मानव अवशेषों में प्राचीनतम् है। इसका नाम नर्मदा मानव रखा गया है।
डॉ. एच.डी. सांकलिया तथा सुपेरकर को महादेव पिपरिया (होशंगाबाद) से 860 औजार प्राप्त हुए हैं तथा जबलपुर के भेड़ाघाट के समीप जल प्रक्रिया द्वारा बेल्लित पर्व (फ्लेक) के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त नरसिंहपुर के निकट भुत्तरा नामक स्थान से पाषाण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं, जो मध्य प्रदेश के सबसे प्राचीन उपकरण माने जाते हैं।
मध्यपाषाण काल (Mesolithic Period)
होशंगाबाद जिले में स्थित आदमगढ़ शैलाश्रय से आर बी. जोशी ने मध्य पाषाण कालीन लगभग 25 हजार लघुपाषाण उपकरण प्राप्त किये हैं। आदमगढ़ से मानव के पशुपालक होने का प्रथम साक्ष्य प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त यहाँ से मानव शव के साथ कुत्ते के दफनाये जाने का प्रमाण भी मिलता है।
सी.एल. कालाईल द्वारा वर्ष 1867 में विध्य क्षेत्र में लघु पाषाण उपकरणों की खोज की गई थी। धार जिले में स्थित प्रसिद्ध बाघ गुफाओं (बाधिन नदी के तट पर) के समीप मध्य पाषाण काल से लेकर नवपाषाण काल तक के उपकरणों की प्राप्ति हुई है।
नवपाषाण काल (Neolithic Period)
भोपाल में स्थित मनुआमान टेकरी, नेवरी गुफा तथा श्यामला पहाड़ी के शैलाश्रयों से अनेक खांदार कोड तथा लघु पाषाण उपकरण प्राप्त हुए। भोपाल के बैरागढ़ में अर्द्धचन्द्राकार, समलम्ब आदि नवपाषाण काल उपकरण प्राप्त हुए हैं।
जबलपुर में नर्मदा नदी के भेड़ाघाट तिलवाड़ा घाट तथा लमेटाघाट में नव पाषाणकालीन मानव बस्तियों के प्राप्त हुये है। इसके अतिरिक्त रीवा संभाग के अंतर्गत सोन नदी की तलहटी तथा ईटार पहाड़ , बनास तथा मोहन नदी घाटी के मध्य अनेक नवपाषाण कालीन उपकरणों की प्राप्ति हुई है।
प्राप्त हुए हैं।
रीवा जिले में चचाई जल प्रपात तथा गोविन्दगढ़ तालाब के निकट लघु पाषाण कालीन उपकरण खोजे गए हैं। दमोह जिले के दक्षिण-पूर्व में स्थित संग्रामपुर घाटी से वर्ष 1866 में नवपाषाण कालीन अवशेषों की प्राप्ति हुई है।
ताम्रपाषाण काल (chalcolithic period)
मध्य प्रदेश में ताम्रपाषाण काल के अवशेष मालवा क्षेत्र के नवदाटोली, नागदा, कासया, आवरा, रण तथा बेसनगर आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
इन स्थानों पर उत्खनन से मृदभाण्ड, धातु निर्मित बर्तन एवं उपकरण आदि प्राप्त हुए हैं। 1869 ई. में जबलपुर से एक कुल्हाड़ी ( तांबा एवं टिन निर्मित के साक्ष्य प्राप्त हुए है। जबकि वर्ष 1970 में डोंगरिया (बालाघाट) के समीप ग्रामीणों को 424 तांबे के उपकरण एवं 102 चाँदी के आभूषण प्राप्त हुए।
मध्य प्रदेश के प्रमुख शैलाश्रय एवं शैलचित्र शैलाश्रय एवं शैलचित्र
शैलाश्रय एवं शैलचित्र स्थान
1. लिखी छाज शैलाश्रय करसा, मुरैना
2. लिखी दंत शैलचित्र चंदेरी, अशोक नगर
3. दाता शैलचित्र बिजावर , छतरपुर
4. चुरनागुंदी कानती , होशंगाबाद
5. निशांगढ़ काजरी शैलचित्र पचपढी, होशंगाबाद
6. वेलखंदार शैलचित्र पचपढी, होशंगाबाद
7. हर्रापाल बोरी, होशंगाबाद
8. झिंझारी शैलाश्रय कटनी
9. रानी मांची शैलाश्रय चितरंगी , सिंगरौली
रायसेन जिले के भीमबेटका में लगभग 700 शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं, जिसमें लगभग 500 शैलाश्रयों में चित्रांकन किया गया है। इन चित्रों में मुख्यतः लाल व सफेद रंगों का उपयोग किया गया है। होशंगाबाद जिले (पचमढ़ी) के पनारपानी ग्राम में स्थित मामा भांजा शैलाश्रय में लगभग 29 चित्र हैं।
मालवा की ताम्रपाषाण संस्कृति
मध्य प्रदेश में सर्वप्रथम नवदाटोली और महेश्वर को उत्खननों से विशिष्ट रूप की ताम्रपाषाणिक सभ्यता प्रकाश में आई। इसे मालवा (नवदाटोली) ताम्रपाषाणिक संस्कृति कहते हैं। नवदाटोली नर्मदा घाटी के उत्तरी तट पर तथा महेश्वर, नर्मदा घाटी के दक्षिणी तट पर स्थित। हैं। इस संस्कृति के अन्य स्थल नागदा, एरण, कायथा, मनोती तथा इनामगाँव हैं। इस संस्कृति से सम्बंधित स्थलों के उत्खनन एवं सर्वेक्षण का मुख्य श्रेय एच.डी. सांकलिया को जाता है।
इस संस्कृति का प्रमुख स्थल कायथा है। यह उज्जैन से 25 किमी. दूर चंबल की सहायक नदी काली सिंध के दाएँ तट पर स्थित है। इसकी खोज वर्ष 1964 में बी.एस. वाकणकर ने की थी। मालवा के विभिन्न स्थलों से भूरे रंग के मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं। इन मृद्भाण्डों का अलंकरण ऊपरी आरेख एवं चिपकावा विधि द्वारा काले व गुलाबी रंग से किया गया है। इसे मालवा की मृद्भाण्ड परम्परा कहा जाता है।
यहाँ के निवासी गृह निर्माण में मिट्टी और बांस का प्रयोग करते थे। इस संस्कृति का आर्थिक ढाँचा ग्राम प्रधान था। यहाँ के निवासियों का प्रमुख कार्य कृषि पशुपालन था। एच. डी. सांकलिया ने इस संस्कृति की तिथि 1000- 500 ईसा पूर्व अनुमानित की थी, पर रेडियो कार्बन 14 विधि के अनुसार, इसकी 1700-1200 ईसा पूर्व प्रतीत होती है।
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