Happy teachers day 2021
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति रहे वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद् ,महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिंदु विचारक थे उनके इन्हीं गुणों के कारण सन 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था ।
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डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में:
सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन 5 सितंबर भारत में शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाता हैं। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुतली ग्राम में 5 सितंबर 1888 को हुआ था जो तत्कालीन मद्रास से लगभग 64 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया वह एक ब्राह्मण परिवार था उनका जन्म स्थान एक पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात रहा है डॉक्टर राधाकृष्णन के पूर्वज सर्वपल्ली नामक स्थान में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में वे तिरुतली ग्राम की ओर स्थानांतरित हो गए लेकिन उनके पूर्वज चाहते थे कि उनके नाम के साथ उनके जन्म स्थान का नाम भी जुड़ा रहे इसी कारण उनके परिजन अपने नाम के पहले सर्वपल्ली लगाने लगे।
राधाकृष्णन एक गरीब किन्तु विद्वान ब्राह्मण की संतान थे उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरा स्वामी और माता का नाम सीता माता था तथा उनके पिता राजस्व विभाग में काम करते थे उन पर बहुत बड़े परिवार के भरण पोषण का दायित्व था ।
वीरा स्वामी के पांच पुत्र और एक पुत्री थी और राधाकृष्णन दूसरे स्थान पर थे उनके पिता काफी कठिनाइयों से परिवार का निर्भान कर रहे थे इसी कारण बालक राधा कृष्ण को बचपन में कोई विशेष सुख प्राप्त नहीं हुआ।
राधाकृष्णन की शिक्षा :
राधा कृष्ण का बचपन तिरुतली एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर व्यतीत हुआ उन्होंने प्रथम 8 वर्ष तिरुतली में ही गुजारे हालांकि उनके पिता पुराने विचारों के हैं और उनमें कुछ धार्मिक भावनाएं भी थी इसके बावजूद उन्होंने राधा कृष्ण को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लोथरण मिशनरी स्कूल तिरुपति में 1896 से 1900 पढ़ने के लिए भेजा । फिर अगले 4 वर्ष यानी 1900 -1904 तक उनकी शिक्षा बेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की ।
वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे इन 12 वर्षों के अंतराल में राधा कृष्ण ने बाइबिल के महत्वपूर्ण अंश भी याद कर लिये इसके लिए उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान प्रदान किया गया । इस उम्र में उन्होंने वीर सावरकर और स्वामी विवेकानंद का भी अध्ययन किया, उन्होंने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें भी छात्रवृत्ति प्राप्त हुई इसके बाद उन्होंने 1904 में कला संकाय की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की ।
राधाकृष्णन की रुचि :
उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी प्राप्त अंकों के कारण मिली इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी। दर्शन शास्त्र में एमए करने के पश्चात 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए ।
डॉ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से पूरे विश्व को भारतीय दर्शनशास्त्र से परिचित कराया सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गई।
राधाकृष्णन का विवाह :
उस समय में मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही शादी संपन्न हो जाती थी और राधा कृष्ण भी उसके अपवाद नहीं रहे।
1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह एक दूर की रिश्तेदार शिवा कामों के साथ संपन्न हो गया उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी इसी कारण 3 वर्ष बाद ही उनकी पत्नी ने उनके साथ रहना शुरू किया हालांकि उनकी पत्नी शिवा काम्मो ने परंपरागत रूप से शिक्षा प्राप्त नही की थी लेकिन उनका तेलगू भाषा पर अधिकार था वे अंग्रेजी भाषा लिख व पढ़ सकती थी । 1908 में राधा कृष्ण दम्पत्ति को सन्तान के रुप में पुत्री की प्राप्ति हुई ।
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राधाकृष्णन की आगे की शिक्षा:
राधाकृष्णन ने 1908 में ही कला स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और दर्शनशास्त्र में विशिष्ट योग्यता प्राप्त की । उच्च अध्ययन के दौरान बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम किया करते थे 1908 में उन्होंने की एम ए की उपाधि प्राप्त करने के लिए एक शोध भी लिखा जिस समय उनकी आयु मात्र 20 वर्ष की थी ।
जल्दी ही उन्होंने वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन कर लिया । हिंदी और संस्कृत भाषा का भी अध्ययन किया। शिक्षा का प्रभाव जहां प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है उस समय क्रिश्चन संस्थाओं द्वारा पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों के भीतर काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थानों में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गए लेकिन एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था कुछ लोग हिंदुत्ववादी विचारों को नीची नजरों से देखते थे और उनकी आलोचना भी करते थे उनकी आलोचनाओ को डॉक्टर राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिंदू शास्त्रों का गहरा अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया दरअसल राधाकृष्णन ये जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस धर्म की संस्कृति के विचारों में अधिक चेतन्नता है और किस संस्कृति के विचारों में अधिक जढ़ता है इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया था कि भारतीय अध्यात्म काफी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरीओं द्वारा हिंदुत्व की आलोचनाएं निराधार हैं इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो कि प्राणी को जीवन का सच्चा संदेश देती हैं।
डॉ. राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है अतः विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए।
ब्रिटेन के एक विश्वविद्यालय (एडम्बरा) में दिए अपने भाषण में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था मानव को एक होना चाहिए मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति तभी संभव है जब प्रत्येक देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शांति की स्थापना का प्रयत्न करना हो। राधा कृष्णन अपनी बुद्धि से परिपूर्ण व्याख्याओ आनंददायी अभिव्यक्तियों और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मंत्रमुग्ध कर देते थे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वे अपने छात्रों को भी देते थे किसी विषय को पढ़ाने से पहले वे उसका स्वंय गहन अध्ययन किया करते थे दर्शनशास्त्र जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली से सरल, रोचक और सहज बना देते थे।21 वर्ष की उम्र में 1909 में राधा कृष्ण ने मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में जूनियर लेक्चरर के तौर पर दर्शनशास्त्र पढ़ाना प्रारंभ किया यहां उन्होंने 7 वर्ष तक अध्यापन किया बल्कि स्वयं भी भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म का गहराई से अध्ययन किया इस समय उनका वेतन मात्र 37 रु था। 1912 में सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मनोविज्ञान के आवश्यक तत्व शीर्षक से एक लघु पुस्तिका प्रकाशित हुई जो कक्षा में दिए गए बेख्यानों का सँग्रह था इसे उनकी यह योग्यता प्रमाणित हुई कि प्रत्येक पद की व्याख्या करने के लिए उनके पास शब्दों का अनूठा भंडार हैं और उनकी स्मरण शक्ति भी अत्यंत विलक्षण हैं जब राधाकृष्णन यूरोप व अमेरिका प्रवास से भारत लौटे तो यहां के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानक उपाधियां प्रदान कर उनका सम्मान किया ।
1928 की सर्दियों में इनकी प्रथम मुलाकात पंडित जवाहरलाल नेहरू से हुई उस समय हुई जब वे कांग्रेस पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए कलकत्ता आए हुए थे हालांकि उस समय सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय शैक्षिक सेवा के सदस्य होने के नाते किसी भी राजनैतिक संस्करण में हिस्सेदारी नही ले सकते थे। लेकिन फिर भी उन्होंने इस नियम की कोई परवाह नहीं की और भाषण दिया । 1929 में इन्हें लेक्चर देने के लिए मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी द्वारा आमंत्रित किया गया उन्होंने मैनचेस्टर व लंदन में कई लेक्चर दिए इनकी कई शिक्षा सम्बंधित उपलब्धियों के दायरे में कई संस्थानिक कार्यो को देखा जा सकता है ।
शैक्षणिक उपलब्धियाँ :
● 1931 -1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे ।
● आक्सपोर्ट विश्वविद्यालय में 1936 - 1952 तक प्राध्यापक रहे ।
● कलकत्ता विश्वविद्यालय के अंतर्गत जॉर्ज पंचम कॉलेज में प्रोफेसर के रुप में 1937 - 1941 तक कार्य किया।
●1939- 1948 तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे।
● 1953 - 1962 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के चांसलर रहे।
● 1946 में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी।
● 1952 में सोवियत संघ के आने के बाद डॉ राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति निर्वाचित किये गये ।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन :
संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था। पं. जवाहर लाल नेहरू ने इस पद के लिए राधाकृष्णन का चयन करके सभी को चौका दिया था सभी को आश्चर्य था कि इस पद के लिए कॉंग्रेस के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यो नही किया गया । उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी सम्भाला।
राष्ट्रपति राधाकृष्णन :
हमारे देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। इस दिन प्रतिवर्ष भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरुस्कार प्रदान किया जाता हैं ।
हालांकि उन्हें 1929 में ब्रिटिश सरकार द्वारा सर की उपाधि दी गई लेकिन इसका औचित्य स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात समाप्त हो चुका था।
5 सितम्बर शिक्षक दिवस को mppsc target सभी आदरणीय शिक्षकों को सादर नमन करते हैं


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