1857 की महान क्रांति : जानें आज़ादी की पहली लड़ाई के मुख्य बिंदु
1857 ई. की महान क्रांति की शुरुआत मेरठ की पैदल सैनिक टुकड़ी 34 रेजिमेंट से 10 मई को ......
1857 की क्रांति का उदय :-
1856 में अंग्रेजों ने पुरानी बंदूक ब्राउन बेस के स्थान पर नई एनफील्ड राइफल को प्रयोग करने का निर्णय लिया उसके लिए जो कारतूस बनाए गए उन्हें राइफल में भरने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था इन कारतूसो में गाय और सुअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता था यहां चर्बी वाला कारतुस 1857 की क्रांति का मुख्य कारण बना। 29 मार्च, 1857 की तारीख को मंगल पांडे नामक एक सैनिक ने बैरकपुर में गाय की चर्बी मिले कारतूस को मुंह से काटने से स्पष्ट मना कर दिया था और बगाबत कर दी और सभी असन्तोष सैनिको को लेकर दूसरे दिन ये सिपाही दिल्ली पहुँचे। जहाँ दिल्ली के असन्तोष सिपाही भी इनसे मिल गए। दिल्ली पर उनका अधिपत्य हो गया। अस्सी साल के बूढ़े मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को भारत का बादशाह घोषित किया गया व विद्रोह का नेतृत्वकर्ता बनया गया।
सन् 1857 ई. का विद्रोह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा विद्रोह था। अनेक दृष्टियों से भारतीय इतिहास में यह एक अभूतपूर्व विद्रोह था।
ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से देश के विभिन्न प्रदेशों के सैनिक और विभिन्न राज्यों के शासक व सरदार लड़ाई के लिए एकजुट हुए। समाज के कई अन्य समुदाय जमींदार, किसान, दस्तकार, विद्वान भी इस विद्रोह में शामिल हुए।
1857 की क्रांति का स्वरूप :-
सन् 1857 ई का विद्रोह भारतीय इतिहास का गौरवशाली अध्यय है। पहली बार देश के विभिन्न भागों के बीच एक ऐसे शासन के विरुद्ध एकता स्थापित हुई थी. जो सबका शत्रु था।
विद्रोह के दौरान ऐसे अनेक नेता और योद्धा उभरे, जिनकी वीरता व बहादुरी ने उन्हें अमर बना दिया।
लेकिन विद्रोह में कुछ बुनियादी कमजोरियाँ थीं जिनके कारण उसके सफल होने की कम उम्मीद थी।
विद्रोह का नेतृत्व राजाओं और जमींदारों के हाथों में था। उनमें से अनेक विद्रोह में इसलिए शामिल हुए थे. क्योंकि ब्रिटिश शासन उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया था। वे भारत को परंपरागत राज्य व्यवस्था के हिमायती थे और पुराने विचारों से प्रभावित थे।
विद्रोह के नेता यद्यपि विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए लड़ रहे थे परन्तु भविष्य के प्रति उनका दृष्टिकोण अनिश्चित था।
यह विद्रोह आम जनता, सैनिकों, किसानों और दस्तकारों आदि के सक्रिय सहयोग से वंचित था। जनता के अपने स्वतंत्र सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्य स्पष्ट नहीं थे।
ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से सभी एकजुट नहीं हो पाए थे। विद्रोही अधिकतर अपने क्षेत्रों में ही लड़ते रहे। विभिन्न क्षेत्रों में विद्रोही शक्तियों के बीच व्यवस्थ ताल-मेल नहीं था।
जिन राजाओं और सरदारों को अंग्रेजों ने पदच्युत नहीं किया था। उनमें से अधिकतर ने विद्रोह के दौरान अंग्रेजों का साथ दिया। विद्रोह में भाग लेने वाले अधिकांश राजा और सरदार वे ही जिनके क्षेत्रों पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया था।
1857 ई. की क्रांति के विद्रोह के मुख्य कारण
ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष :-
विद्रोह का कारण भारत में ब्रिटिश नीतियों से उत्पन्न व्यापक असंतोष था। अंग्रेजों की राज्य विस्तार की नीति के कारण भारत के अनेक शासकों और सरदारों में उनके प्रति असंतोष व्याप्त हो गया था। अंग्रेजों ने उनके साथ सहायक संधि कर ली थी। परन्तु अंग्रेज इन संधियों को मनमर्जी से तोड़ देते थे।
डलहौजी ने राज्य हड़प की नीति (Doctrine of Lopse) को कडी से लागू किया जिससे असंतोष और भी अधिक बढ़ गया। झांसी के मृत राजा के दत्तक पुत्र को डलहौजी ने उत्तराधिकारी नहीं माना तथा 1854 ई. में झांसी पर कब्जा कर लिया।
1851 ई. में पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु हुई, तो उसके दत्तक पुत्र नाना साहब को पेशवा के रूप में मिलने वाली पेंशन देने से अंग्रेजों ने इनकार कर दिया। इसके अतिरिक्त मुगल बादशाह को कह दिया था कि उसके बाद उसके उत्तराधिकारियों को बादशाह नहीं माना जाएगा।
अंग्रेजों ने भू-राजस्व की नई व्यवस्था लागू की, तो भू-स्वामियों के पुराने परिवारों के अधिकार खत्म हो गए। किसी भी राज्य पर अधिपत्य करने के बाद उसकी पुरानी प्रशासन व्यवस्था खत्म कर दी जाती थी।
◆ किसानों एवं दस्तकारों की बर्बादी
अंग्रेजों द्वारा लागू की गई भूमि व्यवस्थाओं से किसानों की हालत बद से बदतर हो गई थी। इंलेण्ड में तैयार हुआ माल भारत में पहुँचने लगा तो यहाँ के पुराने हस्तशिल्प बर्बाद हो गए। जिसके कारण पीड़ित किसान और कारीगर ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए आक्रोश उत्पन्न हो गया और वे एकजुट हो गए।
◆ धर्म और जाति के नष्ट होने का डर
अंग्रेजों की नीति और आचरण में जनता में यह डर था कि ब्रिटिश शासन उनके धर्म और रीति-रिवाजों को नष्ट कर देने पर अड़ा हुआ है।
ईसाई धर्म प्रचारकों में हिंदू व इस्लाम धर्म की और जनता के पुराने रीति-रिवाजों की खुले आम निंदा की और अंग्रेजों ने अनेक मामलों में जाति-नियमों की उपेक्षा की थी। उदाहरण के लिए फौजो , जेलों और रेल यात्राओं के मामलों में।
नई शिक्षण संस्थाओं को जिनमें से कई संस्थाओं की स्थापना ईसाई धर्म प्रचारकों ने की थी , को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। अतः अनेक लोग अपने धर्म के नाम पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह में शामिल हुए।
◆भारतीय सैनिकों की शिकायतें
अंग्रेजों की फौज में भारतीय सिपाहियों के लिए पदोन्नति के रास्ते बंद थे। फौज में ऊँचे पदों पर यूरोपीय अफसरों के लिए सुरक्षित थे। भारतीय और यूरोपीय सैनिकों के वेतनों में बहुत अंतर था। यूरोपीय अधिकारी भारतीय सिपाहियों को नफरत की निगाहो से देखते थे। युद्ध में जाने पर भारतीय सैनिकों को अतिरिक्त भत्ता मिलता था। युद्ध खत्म होने पर और उनके सहयोग से जीते गए इलाके पर अंग्रेजों का अधिपत्य हो जाने के बाद भारतीय सैनिकों का भत्ता बंद कर दिया जाता था।
भारतीय सैनिकों को युद्ध के लिए समुद्र पार भी भेजा जाता था। परन्तु उस समय के हिंदुओं का धार्मिक विश्वास था कि समुद्र पार जाने से धर्म नष्ट हो जाता है।
अन्य भारतीयों की तरह भारतीय सैनिकों में विश्वास बैठ गया कि उनका धर्म खतरे में है। उसी दौरान सैनिकों को एक नए किस्म की एनफील्ड राइफल दी गई, जिसके कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी लगाई जाती थी। इस राइफल में कारतूस भरने के पहले उस पर लगे कागज को दाँतों से काटना पड़ता था।
चर्बी वाले इस करतूसों के इस्तेमाल से हिंदू और मुसलमान सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची अफवाह विद्रोह का तात्कालिक कारण बनी । सैनिकों ने कारतूस भरने से इन्कार कर दिया, जिसके कारण मेरठ में 85 भारतीय सैनिकों को जेल की लंबी सजा सुनाई गई।
भारतीय स्वतंत्रता हेतु प्रथम सशस्त्र विद्रोह का प्रारंभ 10 मई, 1857 को मेरठ स्थित छावनी की 20 एन. आई. तथा तीन एल. सी. की पैदल सैन्य टुकड़ों के द्वारा चर्बी वाले कारतूस के प्रयोग से इन्कार कर विद्रोह कर दिया।
10 मई 1857 ई. को मेरठ में इस विद्रोह की औपचारिक शुरुआत हुई किंतु इससे पूर्व 24 मार्च, 1857 ई. को बैरकपुर छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे ने चर्बी युक्त कारतूस के प्रयोग के विरोध में अपने अधिकारी लेफ्टिनेंट बाग एवं सर्जेण्ट यूरसन को गोली मार दी।
मंगल पाण्डे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गाजीपुर (अब बलिया जिले) रहने वाले थे। हाल में स्थित बैरकपुर छावनी की 30वीं इनफैन्ट्री के जवान थे।
मंगल पांडे को गिरफ्तार कर लिया और 8 अप्रैल, 1857 को सैनिक अदालत ने मंगल पाण्डे को फाँसी की सजा दे दी।
◆विद्रोह का दमन
●सम्पूर्ण विद्रोह के दौरान हिंदू और मुसलमान कन्धे से कन्धे मिलकर लड़े। बरेली में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह खान बहादुर खाँ ने किया।
●फैजाबाद में मौली अहमददुल्ला ने जून 1857 ई में विद्रोह आगवानी की। अहमददुल्ला की कार्यवालियो से त्रस्त होकर अंग्रेजी ने इन पर 50000 रुपये का नकद इनाम घोषित कर रखा था।
● सितंबर 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया। बहादुर शाह को बन्दी बनाया गया। रंगून में अभियोगक (बर्मा) में निर्वासित कर दिया। रंगून में 1862 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
बहादुर शाह के पुत्र मिर्जी मुगल और मियाजा सुल्ताना पोते मिर्जा अधूल को हडसन ने दिल्ली के खूनी दरवाजे के पास गोली मारकर हत्या कर दी।
●सितंबर 1858 में खनक पर ब्रिटिश सैनिकों का अधिकार हो गया। परन्तु बेगम हजरत महल ने समर्पण करने से इन्कार कर दिया और वह नेपाल चली गई।
. रानी लक्ष्मीबाई झाँसी की रानी के नाम से प्रसिद्ध हुई, झांसी से भाग निकली तात्या टोपे की मदद से उसने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। अंत में जून, 1858 ई में लड़ते हुए उनकी मृत्यु हो गई।
नाना साहब नेपाल चले गए। तात्या टोपे मध्य प्रदेश और राजस्थान में अंग्रेजों से दो साल तक लड़ते रहे। एक मित्र के विश्वासघात के कारण वे गिरफ्तार हुए और उन्हें फाँसी दे दी गई।
1858 ई. के अंत तक विद्रोह को कुचल दिया गया था। विद्रोह के दमन के दौरान और उसके पश्चात् ब्रिटिश सैनिकों ने विद्रोही नेताओं, सैनिकों और आम जनता के साथ अमानवीय व्यवहार किया।
• विद्रोह के दौरान भारतीय सैनिकों ने निहत्थे अंग्रेजों और युद्ध बंदियों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। विजयी ब्रिटिश सैनिकों में बड़े पैमाने पर अत्याचार किए और अधिकाधिक संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
. शहरों को विद्रोहियों के अधिकार से मुक्त कराने के पश्चात् ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें खूब लूटा। अनुमान लगाया गया है कि केवल अवध में ही लगभग 150,000 लोगों की मृत्यु हुई बहुत बड़ी संख्या में विद्रोहियों को फाँसी पर चढ़ाया गया तथा अमानवीय यातनाएँ दी गई।


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